हरितालिका तीज पर्व का विवरण दिया गया है।
- पर्व की तिथि: सोमवार, 14 सितम्बर 2026
- प्रातःकाल पूजा मुहूर्त: सुबह सूर्योदय से 07:06 तक
- तृतीया तिथि प्रारम्भ: 13 सितम्बर 2026 को सुबह 07:08 बजे
- तृतीया तिथि समाप्त: 14 सितम्बर 2026 को सुबह 07:06 बजे
हरितालिका तीज पर्व के मुख्य तथ्य:
- महत्व: यह हिंदू धर्म में महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
- व्रत का उद्देश्य: सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए यह व्रत रखती हैं। कुंवारी कन्याएं भी सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं।
- कठोर नियम: यह व्रत आमतौर पर 'निर्जला' (बिना पानी पिये) और 'निराहार' (बिना भोजन किये) रखा जाता है, जो इसे सबसे कठिन व्रतों में से एक बनाता है।
कथा का आरम्भ और पार्वती जी की तपस्या
रमणीक कैलास पर्वत के शिखर पर बैठी हुई श्रीपार्वतीजी ने शिवजी से पूछा कि हे महेश्वर, हमें कोई ऐसा गुप्त व्रत या पूजन बताइये जो सब धर्मों से सरल हो, जिसमें परिश्रम कम करना पड़े, लेकिन फल अधिक मिले। पार्वती जी ने यह भी पूछा कि किस तप, व्रत या दान से आदि, मध्य और अन्त रहित आप जैसे महाप्रभु उन्हें पति रूप में प्राप्त हुए हैं।
शिवजी ने उत्तर दिया कि भाद्रपद मास में हस्त नक्षत्र से युक्त शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को एक उत्तम व्रत का अनुष्ठान करने मात्र से स्त्रियाँ सब पापों से मुक्त हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि बाल्यकाल में पार्वती जी ने हिमालय पर्वत पर कठोर तपस्या की थी। बारह वर्षों तक वे उलटी टँगकर केवल धुआँ पीकर रहीं और चौंसठ वर्षों तक सूखे पत्ते खाकर जीवन व्यतीत किया। माघ मास में वे जल में बैठी रहतीं, वैशाख की दुपहरिया में पंचाग्नि तापतीं और श्रावण महीने में भूखी-प्यासी रहकर खुले मैदान में बैठी रहती थीं। उनकी इस कठोर तपस्या को देखकर उनके पिता हिमवान् बड़े दुःखी हुए।
नारद जी का आगमन और विष्णु जी से विवाह का प्रस्ताव
उसी समय मुनिश्रेष्ठ नारदजी वहाँ आ पहुँचे। नारदजी ने पर्वतराज हिमवान् से कहा कि वे भगवान् विष्णु के भेजे हुए आए हैं और उन्हें अपनी योग्य कन्यारत्न भगवान् विष्णु को ही देनी चाहिए। हिमवान् ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया कि यदि भगवान् विष्णु स्वयं उनकी कन्या ले रहे हैं, तो वे उन्हें अपनी कन्या अवश्य देंगे।
जब हिमवान् ने पार्वती जी को बताया कि उन्होंने उनका विवाह भगवान् विष्णु से तय कर दिया है, तो वे बहुत दुःखी हुईं और बिना उत्तर दिए अपनी सखी के घर जाकर विलाप करने लगीं। सखी के पूछने पर पार्वती जी ने बताया कि वे एकमात्र शिवजी को अपना पति बनाना चाहती हैं, लेकिन उनके पिता ने इस विचार को ठुकरा दिया है, जिससे वे अपने शरीर का त्याग कर देंगी।
वन में गमन और हरितालिका व्रत का अनुष्ठान
पार्वती जी की बात सुनकर सखियों ने उन्हें शरीर त्यागने से रोका और सलाह दी कि वे किसी ऐसे वन में चलें जहाँ पिता को पता न लगे। सखियों द्वारा पार्वती जी को हर कर ले जाने के कारण ही इस व्रत का नाम 'हरितालिका' पड़ा।
वे सखियों के साथ एक भयानक वन में पहुँचीं जहाँ एक नदी के रमणीय तट पर एक बड़ी-सी कन्दरा थी। उसी कन्दरा में पार्वती जी ने अपनी सखियों के साथ निराहार रहकर बालुकामयी प्रतिमा बनाकर शिवजी की आराधना शुरू की। जब भाद्रपद शुक्लपक्ष की हस्तयुक्त तृतीया तिथि आई, तब पार्वती जी ने विधिवत् पूजन किया और रातभर जागकर गीत-वाद्यादि से शिवजी को प्रसन्न किया। इस व्रतराज के प्रभाव से शिवजी का आसन डगमगा उठा और वे तत्काल वहाँ प्रकट हो गए। शिवजी ने प्रसन्न होकर पार्वती जी को पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया और 'तथास्तु' कहकर कैलास लौट गए। इसके बाद पार्वती जी ने प्रतिमा को नदी में प्रवाहित कर दिया और सखियों के साथ महाव्रत का पारण किया।
हिमवान् का आना और शिव-पार्वती विवाह
पार्वती जी को खोजते हुए उनके पिता हिमवान् उस वन में आ पहुँचे। जब उन्होंने पार्वती जी से वन में आने का कारण पूछा, तो पार्वती जी ने स्पष्ट किया कि वे स्वयं को शिवजी को सौंप चुकी हैं और पिता द्वारा बात टालने के कारण ही वे यहाँ आईं। हिमवान् ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली, उन्हें घर ले आए और शिवजी के साथ उनका विवाह संपन्न कराया।
व्रत के नियम और माहात्म्य
शिवजी ने बताया कि जो स्त्री अपने सौभाग्य की रक्षा करना चाहती है, वह यत्नपूर्वक इस व्रत को करे।
- केले के खम्भे और रंग-बिरंगे रेशमी कपड़ों से मण्डप बनाकर, सुगन्धित द्रव्यों से उसे सजाकर पार्वती तथा शिवजी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
- दिनभर उपवास कर विविध फल, फूल, सुगन्ध, धूप, दीपादि और नैवेद्य से पूजा कर रातभर जागरण करना चाहिए।
- जो स्त्री एकचित्त होकर इस प्रकार पूजन करती है, वह सब पापों से छूट जाती है और उसे सात जन्म तक सुख तथा सौभाग्य प्राप्त होता है।
- इसके विपरीत, जो स्त्री तृतीया तिथि का व्रत न कर अन्न भक्षण करती है, वह सात जन्म तक बन्ध्या रहती है और उसे बार-बार विधवा होना पड़ता है।
- व्रत के दिन अन्न खाने से सूकरी, फल खाने से बंदरिया, पानी पीने से जोंक, दूध पीने से साँपिन, सोने से अजगरी और पति को धोखा देने से मुर्गी का जन्म मिलता है, इसलिए स्त्रियों को यह व्रत अवश्य करना चाहिए।
- दूसरे दिन सुवर्ण, चाँदी, ताँबा अथवा बाँस के पात्र में अन्न भरकर ब्राह्मण को दान देना चाहिए और फिर पारण करना चाहिए।
- इस हरितालिका की व्रत कथा को मात्र सुन लेने से प्राणी को एक हजार अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है।
मंगलाकांक्षी
आचार्य सोहन वेदपाठी 9463405098 https://www.facebook.com/acharyag1001
